उपमन्यु नाम का एक अति तेजस्वी बालक था। उसने अपने मामा के घर जाकर थोड़ा सा दूध पिया था। मामा के पुत्र ने इस इर्ष्या के कारण उसे दूध नहीं पीने दिया और पूरा दूध स्वयं पी गया। उपमन्यु ने अपनी मां से गरम – गरम उत्तम दूध और माँगा। उसकी मां में उसे बहुत समझाया। परंतु उपमन्यु ” दूध और दो, दूध और दो ” ऐसी बातें कहता हुआ जोर-जोर से रोने लगा। फिर उसकी मां ने उसे कुछ अन्नों के दाने पीसकर उसे जल में घोलकर माता ने दुखी होकर उसे दे दिया। उस बनावटी दूध पीकर उपमन्यु ने अपनी माता से कहा – हे माता! यह दूध नहीं है। माता ने चुंबन करके और उसके नेत्रों को पौंछकर कहा – हे पुत्र! रत्नपूर्ण नदी स्वर्ग से लेकर पाताल तक बह रही है। परंतु भाग्यहीन और शिव की भक्ति से हीन मनुष्य उसे देख नहीं पाते है। राज्य, स्वर्ग, मोक्ष, दूध से बने उत्तम भोग तथा और भी उत्तम वस्तु उन्हें नहीं मिल पाती जिन पर शिव प्रसन्न न हो। यह सब भगवान शिव की कृपा से मिलते हैं। दूध हमें कहां मिलेगा, पूर्व जन्म में हमने न तो शिव का पूजन किया होगा, न ही शिव का लक्ष्य जप पूरा किया होगा तभी इस जन्म में शिव हमसे प्रसन्न नहीं है। यह सुनकर बालक माता को प्रणाम करके बोला – हे माता! तू शोक को त्याग। हे माता! यदि महादेव कहीं पर है तो चिरकाल में अथवा शीघ्र ही दूध का समुद्र उनको प्रसन्न करके प्राप्त करूंगा।
इस प्रकार माता को प्रणाम करके बालक उपमन्यु तपस्या को चल दिया और माता ने उसको आशीर्वाद दिया। वह हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगा और केवल वायु पीकर रहने लगा। इसकी घोर तपस्या से जगत जलने लगा। देवता आदि सभी घबराकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु भगवान सब कारण जानकर महेश्वर के पास पहुंचे और हाथ जोड़कर प्रणाम करके उनसे बोल – हे भगवन्! यह उपमन्यु नाम का बालक दूध के लिए तपस्या करके सारे जगत को जलाए डाल रहा है, इसको रोकिए। भगवान विष्णु की बात सुनकर महादेव इंद्र का रूप धारण करके उस स्थान पर गए जहां पर उपमन्यु तपस्या कर रहा था। उपमन्यु को देखकर इंद्र का रूप धारण किए हुए शिव जी ने कहा – हे बालक! तू वर मांग, मै तुझे वर दूंगा, तेरे तप से मैं प्रश्न हूं। तब बालक उपमन्यु ने कहा – मैं शिव से भक्ति चाहता हूं। तब इंद्र रूप धारी शिव ने कहा – हे बालक ! तीनों लोकों के द्वारा नमस्कृत, सब देवों का स्वामी मैं देवराज इंद्र हूं, मुझ को जान, मेरी भक्ति कर, सब प्रकार का वैभव तुझको दूंगा, और तेरा कल्याण करूंगा। यह निर्गुण शिव को त्याग और मेरी शरण में आ जा ।
कानों का विदीर्ण करने वाले उस इंद्र की बात सुनकर बालक उपमन्यु बोले कि तुम कोई अधर्मी दैत्य हो और मेरा धर्म बिगाड़ने आए हो, जो शिव की निंदा कर रहे हो। मेरा अनुमान है कि पूर्व जन्म में मेरा कोई पाप था जो शिव की निंदा आज सुनी। शिव की निंदा सुनकर तुरंत देह त्याग कर देना चाहिए अथवा निंदक का वध कर देना चाहिए। ऐसा करने वाला शिवलोक को पता है। पहले माता ने ठीक ही कहा था कि पूर्व जन्म में हमने शिव की पूजा नहीं की थी। शिव की निंदा करने वाले की जीभ को जो काट देता है, वह अपने इक्कीस कुलों का उद्धार करके शिवलोक को जाता है। ऐसा कहकर इंद्र रूपी शिव को मारने की इच्छा की। भस्म की मुट्ठी भरकर उसने इंद्र पर फेंकी और अपनी देह को जलाने के लिए आग्नेय मंत्र का ध्यान किया।
भगवान शंकर ने तब चंद्रकास्त्र से उस अस्त्र का निवारण किया। और अपना असली स्वरूप उपमन्यु को दिखाया। हजारों दूध की धाराएं, दूध का समुद्र, दही आदि का समुद्र, बालकों के भोज्य पदार्थ का समुद्र, पूजाओं का पर्वत सामने दिखाते हुए शिवजी उससे बोले – हे ब्राह्मण! भाई बंधुओं सहित इन सब का उपभोग कीजिए। पुनः गिरजा की तरफ देखते हुए हंस कर कहा – हे देवी! मैंने इसे पुत्र रूप में स्वीकार कर लिया है, और हे मुनि! अब तेरा पिता महादेव और माता जगन्माता पार्वती है। मैं तुझे अमर बना और अपना गाणपत्य पद देता हूं जो भी और कुछ मांगना हो वह मुझसे कहो। ऐसा कहकर महादेव ने दोनों हाथों से उठाकर उसके माथे में चुंबन किया और देवी को दिया। देवी ने प्रसन्न होकर उसको योग, ऐश्वर्य, विद्या तथा सदा कुमारत्व का वरदान दिया। वह बालक हाथ जोड़कर गद् गद् वाणी से शंकर और पार्वती की स्तुति करता हुआ बोला – हे देवो के देव! मुझ पर प्रसन्न होइये और आपकी भक्ति सदा बनी रहे तथा आपसे निकटता हमेशा बनी रहे। इस प्रकार मुनि के कहने पर भगवान शिव ने उन्हे वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गये।