हिन्दू धर्म के भक्ति आंदोलन में दक्षिण भारत से अनेक महान संत हुए जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि भक्ति किसी भी जाति, कुल या पद की मोहताज नहीं होती। इन संतों में सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं नयनार संत, जो भगवान शिव के परम भक्त थे।
नयनार कौन थे?
“नयनार” शब्द तमिल परंपरा से लिया गया है। इसका अर्थ है “नेता या पूजनीय”। ये सभी संत 6वीं से 8वीं शताब्दी के बीच हुए।
इन संतों ने भगवान शिव की भक्ति में अपना जीवन समर्पित किया।
इनमें राजा से लेकर साधारण किसान, स्त्री से लेकर शिकारी तक सभी वर्ग के लोग शामिल थे।
इन्होंने जाति-पांति से ऊपर उठकर केवल शिवभक्ति को ही अपना लक्ष्य बनाया।
इनमे सबसे प्रमुख कथा कन्नप्पा नयनार की है, जो ऐसा शिवभक्त हुआ जिसने शिवलिंग पर मांस चढ़ाया और मुँह से जल चढ़ाया। जब शिव जी ने इसकी परीक्षा ली तो शिवलिंग की आँखों से खून बहता हुआ देख यह अपनी दोनों आँखे शिवलिंग पर चढ़ाने लगा। तब शिव जी ने इसे साक्षात् दर्शन दिए और उसकी आँखों की रौशनी वापस लौटा दी।
इनकी कथाएँ “पेरियपुराणम्” नामक ग्रंथ में संग्रहीत हैं, जिसे संत सेक्खिझार ने लिखा।
63 नयनार संतों के नाम
नीचे सभी नयनार संतों की सूची दी जा रही है –
- अप्पार (तिरुनावुक्कारसर)
- सुंदरर
- तिरुज्ञाना सम्बंदर
- इयरक्गैयार
- करिकल चोलन
- चेरामान पेरुमाल
- कोचेंगेझ चोलान
- कुलचिरैयार
- इलायंकुडी मारन
- मुरुगनार
- तिरुनिला कंठनार
- मूनारूरार
- कन्नप्पा नयनार
- मेइप्पोरुल नायनार
- मुरुगन नायनार
- मंगैयार्क्करशियार
- ईयारक्गैयार
- अय्याडिगल कडवुल
- नेडुमर नायनार
- नल्ला नायनार
- पूसालार नायनार
- पेरुंजेरियार नायनार
- चंडिकेस्वर
- सोमासी मार नायनार
- अप्पूदी अडिगल
- कलिकाम नायनार
- नमि नंदि अडिगल
- तिरुनालैपवत्तर
- वायिलार नायनार
- विरण मुरुकनार
- तिरुनेलवैयलार
- कोरप्पनार
- कांचीपगुपति
- कुरुम्बर नायनार
- कारिक्का नायनार
- कुट्रुव नायनार
- एरिपथ नायनार
- मणक्कंचार नायनार
- तिरुनीलकंठ नायनार
- पुकझ्चोझा नायनार
- कुट्रुव नायनार
- मुरुगन नायनार
- एरिपथ नायनार
- नल्ली नायनार
- कारिक्का नायनार
- पूसालार नायनार
- तिरुनीलाकंठनार
- तिरुनेलवैयलार
- कोरप्पनार
- तिरुनालैपवत्तर
- एरिपथ नायनार
- मणक्कंचार नायनार
- इलायंकुडी मारन
- कोचेंगेझ चोलान
- चंडिकेस्वर
- अप्पूदी अडिगल
- सोमासी मार नायनार
- मंगैयार्क्करशियार
- करिकल चोलन
- पुकझ्चोझा नायनार
- चेरामान पेरुमाल
- सुंदरर
- तिरुज्ञाना सम्बंदर
नयनार संतों का संदेश
सच्ची भक्ति का मार्ग ही ईश्वर तक पहुँचाता है।
जाति, पद, धन या शक्ति से बड़ा केवल प्रेम और समर्पण है।
शिवभक्तों की सेवा करना ही भगवान शिव की सेवा है।
निष्कर्ष
63 नयनार संतों की कहानियाँ आज भी हमें सिखाती हैं कि जब हम सच्चे मन से ईश्वर को अपना मान लेते हैं, तो कोई बंधन हमें रोक नहीं सकता ईश्वर से मिलने से। सभी मनुष्य ईश्वर के बनाये हुए है तो उनमें कोई भेद भाव नहीं होना चाहिए। ईश्वर को प्रेम से जो भी अर्पण करो वो उसे स्वीकार करते है।