दारुक नाम वाला एक असुर हुआ। जिसने तपस्या के द्वारा वरदान प्राप्त किया था वह उसके प्रभाव से देवों और ब्राह्मणों को प्रलय की अग्नि के समान दुख देने लगा। दारुक के द्वारा पीड़ित हुए देवता, ब्रह्मा, ईशान, कुमार, यम, इंद्र, विष्णु आदि की शरण में पहुंचे और कहा कि हे महाराज ! यह दैत्य स्त्री के द्वारा वध करने योग्य है। तब ब्रह्मा आदि सभी स्त्री बनकर उससे लड़ने गए परंतु उन सब को उस दैत्य ने ताड़ित करके भगा दिया। देवता पुनः ब्रह्मा जी के पास गए और स्तुति करने लगे। तब ब्रह्मा जी देवेश शिव जी के पास पहुंचे और प्रणाम करके बोले – हे भगवन्! स्त्री के द्वारा ही इस असुर का वध होगा, इसका उपाय बता कर दारुक से रक्षा कीजिए।
यह सुनकर शिवजी हंसते हुए गिरजा पार्वती से बोले – हे कल्याणी ! जगत के हित के लिए और स्त्री के द्वारा वध योग इस दारुक को मारने के लिए मै तुमसे प्रार्थना करता हूं । ऐसा सुनकर देवी पार्वती के एक अंश से महेश्वर के शरीर में प्रवेश कर गई। इस भेद को इंद्र आदि देवताओं और ब्रह्मा ने नहीं समझा। देवी को शिव के पास पूर्वत् बैठी देखा क्योंकि वे सब देवी की माया से मोहित हो गये। पार्वती ने शिव के शरीर में प्रवेश करके उनके कंठ में स्थित विष से अपना शरीर धारण किया जो काले वर्ण वाला हुआ। तब शिव ने अपनी तीसरी नेत्र से उन्हें बाहर उत्पन्न किया। उस समय दैत्यों के नाश के लिए और भवानी और भोलेनाथ की तुष्टि के लिए विष से काले कंठ वाली उस काली के रूप को देखकर डर के मारे देवता और सिद्ध लोग भागने लगे। उस काली के ललाट में तीसरा नेत्र है, ललाट में चंद्र रेखा है। कंठ में कराल विष का चिन्ह है, हाथ में भयंकर त्रिशूल है। नाना प्रकार के आभूषण है, दिव्य वस्त्र धारण किए हुए हैं।

इसके बाद देवी काली ने पार्वती के आज्ञा से देवताओं को दुख देने वाले दारुक असुर को मार दिया। परंतु उनके क्रोध की ज्वाला से संपूर्ण लोक जलने लगा। देवी के क्रोध शांति के लिए शिव ने श्मशान में बालक का छोटा रूप धारण किया और बच्चे के समान रोने लगे। भगवान की माया से मोहित हुई देवी उस बालक को उठाकर पुचकार कर अपने स्तनों से दूध पिलाने लगी। शिव रूपी बालक ने उनके दूध के साथ ही उनके क्रोध का भी पान कर लिया। उनके क्रोध से आठ मूर्ति हुई जो क्षेत्रपाल कहलाई। इस प्रकार बालक रूपी शिव ने उस देवी का क्रोध पी लिया तो वह मूर्छित हो गई। तब उस देवी को होश में लाने के लिए शिवजी ने तांडव नृत्य किया। सायंकाल के समय सब भूतों और प्रेतों के सहित शिव ने तांडव किया। शंभू के नृत्य रूपी अमृत का पान कर वह भी नाचने लगी। तब उनकों योगिनी कहा गया।
उस समय ब्रह्मा, इंद्र, देवताओं आदि ने उस देवी काली की तथा पार्वती की स्तुति कर प्रणाम किया। इस प्रकार त्रिशूल धारण करने वाले शिव का तांडव नृत्य आरंभ हुआ।