रावण के पिता विश्रवा मुनि के जन्म की कथा तथा विश्रवा पुत्र वैश्रवण कैसे कुबेर बने।

पूर्व सतयुग में ब्रह्मा के एक पुत्र पुलस्त्य नामक थे। जिनके तप का प्रभाव ब्रह्मा जी के ही समान था और वह विमल गुणवान भी थे। इसलिए वह सभी के मित्र बन गए। तप करने की इच्छा से वे मुनिश्रेष्ठ मेरु पर्वत के समीप तृणबिंदु के आश्रम में जाकर तप करने लगे। तब उनको तप स्वाध्याय में देखने के लिए बहुत सारी कन्याएं जाने लगी। उनमें अप्सराय भी रहती और यह सब ऋषियों, नागों और राजर्षियों की कन्याएँ थी। इनके कारण तपस्वी पुलस्त्य के तप में विघ्न पड़ने लगा। इससे एक दिन पुलस्त्य जी ने कह दिया कि अब कल से जो कन्या मुझे यहां दिखाई पड़ेगी वह गर्भवती हो जाएगी। इस ब्रह्माशाप के भय से दूसरे दिन कन्या वहां नहीं गई। परंतु उनमें राजर्षि तृणबिंदु की कन्या ने यह नहीं सुना था, इसलिए वह दूसरे दिन पुलस्त्य जी के आश्रम में चली गई और स्वच्छन्दा से विचरने लगी।

परंतु उसने अन्य कन्याओं को वहां नहीं देखा। इससे उसे कुछ आश्चर्य हुआ। फिर भी वह राजर्षि कन्या वेद ध्वनि सुनने की इच्छा से मुनि का दर्शन करने चली गई। किंतु जैसे ही उसने उन तेजस्वी मुनि को देखा, वैसे ही उसका शरीर पीला पड़ गया और वह गर्भवती हो गई। वह अपना शरीर देखकर डर गई और वह भागकर अपने पिता के आश्रम चली आयी। उसके पिता ने जैसे ही उसे देखा तो उससे अपने भयभीत होने का समाचार पूछा तो उसने कहा – आज पुलस्त्य मुनि की आश्रम में जाते ही मेरे अंगों में यह परिवर्तन अनायास हो आया। मुनि तृणबिन्दु ने अपने नेत्र बंद करके देखा तो उन्हें सब कुछ ज्ञात हो गया। वे अपनी पुत्री को साथ ले पुलस्त्य मुनि के आश्रम लेकर आए और उनसे प्रार्थना पूर्वक अपनी पुत्री को सेवकिनी बना लेने की प्रार्थना की। ब्राह्मण श्रेष्ठ पुलस्त्य जी धार्मिक राजर्षि तृणबिन्दु के उन वचनों को सुन उस कन्या को स्वीकार कर लिया।

विश्रवा मुनि की जन्म की कथा

कन्या को पुलस्त्य जी को सौंप राजर्षि तृणबिन्दु अपने आश्रम में लौट आए। वह कन्या भी अपने गुणों से पति को संतुष्ट कर वहां रहने लगी। तब एक दिन उसके शील-स्वभाव से संतुष्ट हो मुन्नीश्रेष्ठ पुलस्त्य जी उससे बोल कि ‘हे सुश्रोणि! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं, इसलिए हे देवी! आज मैं अपने ही तुल्य एक ऐसा पुत्र देता हूं कि जो उत्तम वशों का वर्द्धक होगा और पौलस्त्य नाम से प्रसिद्ध होगा।

परंतु तुमने मेरी ध्वनि सुनकर गर्भधारण किया है जिससे उसका नाम विश्रवा होगा। ऐसा वर पाकर वह देवी प्रसन्न हुई। फिर तो कुछ ही समय पश्चात त्रिलोक विख्यात यशोधर्म समन्वित विश्रवा नामक पुत्र को जन्म दिया। यह विश्रवा भी वेदज्ञ मुनि व्रतचारी तथा अपने पिता के समान तपस्वी हुए।

अल्पकाल में ही पुलस्त्य पुत्र मुनिश्रेष्ठ विश्रवा अपने पिता के ही समान तप करने लगे। वे सत्यवादी, शीलवान, जितेन्द्रिय, स्वाध्याय निरत, पवित्र भोगों में अनासक्त और सर्वदा धर्म तत्पर रहा करते थे। जब विश्रवा के आचरण को देखकर महामुनी भारद्वाज ने अपनी देवकन्या तुल्य सुंदरी कन्या का उनसे विवाह कर दिया।

धनाध्यक्ष कुबेर के जन्म की कथा तथा वैश्रवण से कुबेर बनने की कथा

फिर उस कन्या से धर्मात्मा मुनि विश्रवा ने एक ऐसा पुत्र उत्पन्न किया जो समस्त गुणों से युक्त अद्भुत परम बलवान था। उसके जन्म से पितामह पुलस्त्य जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने पुत्र में कल्याणकारी बुद्धि देखकर कहा कि यह तो धनाध्यक्ष होगा। फिर तो उन्होंने ही देवर्षियों सहित उसका नामकरण किया और कहा कि यह पुत्र विश्रवा से उत्पन्न हुआ है और वैसा है भी।

अतः इसका नाम वैश्रवण होगा। फिर तो उस आश्रम में रहकर वैश्रवण महान तेजस्वी हुए। उन्होंने सोचा कि धर्म की परम गति है अतः मैं भी धर्माचरण करूंगा। उन्होंने कठिन व्रत के साथ हजारों वर्ष के घोर तप किए, जिसमें वे कभी जल पीकर, कभी वायु पानकर और कभी निराहार भी रह जाते थे।

इस प्रकार उन्होंने एक हजार वर्ष, एक वर्ष की भांति व्यतीत कर दिए। तब तो ब्रह्मा जी उनके इस तप को देखकर प्रसन्न हो गए और इन्द्रादि देवताओं को साथ ले उन्हें वर देने के लिए उनके आश्रम पधारे और बोले – हे वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, वर मांगो।

तब अपने समक्ष ब्रह्मा जी को उपस्थित देख वैश्रवण ने कहा – हे भगवन! मेरी इच्छा है कि मैं लोकपाल बनुँ और समस्त धन मेरे पास रहे। वैश्रवण की यह बात सुनकर ब्रह्मा जी को और भी प्रसन्नता हुई और उन्होनें ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार की तथा वैश्रवण से फिर बोले – हे वत्स! मैं चौथा लोकपाल रचने ही वाला था, अब तुम ही उस पद को स्वीकार करो। जाओं अपार धन के स्वामी बनो। इंद्र, वरुण और यम के साथ तुम्हारा चौथा स्थान होगा। यह सूर्य के समान तेजस्वी पुष्पक विमान है, इसे तुम अपनी सवारी के लिए लो और आज ही से देवताओं की समानता प्राप्त करो। अब मैं अपने लोक को जाता हूं, तुम्हारा कल्याण हो।

ऐसा कहकर ब्रह्मा जी अपने लोक को चले गये। ब्रह्मादि देवताओं के चले जाने पर धनेश वैश्रवण जी ने अपने माता – पिता से कहा -भगवन! मैंने पितामह ब्रह्मा जी से अभीष्ट वरदान तो प्राप्त किया है, किन्तु उन्होंने मेरे रहने का कोई स्थान नहीं बताया है। अतः आप मेरे लिए किसी ऐसे निवास स्थान का विचार कीजिये, जहाँ रहने से किसी प्राणी को कष्ट न हो। पुत्र के इस प्रकार कहने पर मुनिश्रेष्ठ विश्रवा बोले- पुत्र! सुनो! दक्षिण समुद्र के तट पर एक त्रिकुट नामक पर्वत है, जिसके शिखर पर एक विशाल पूरी है, जिसका नाम लंका है।

विश्वकर्मा ने उसे राक्षसों के लिए बनाया था।वह अमरावती के सामान ही रमणीक है। अतः तुम लंका में ही निवास करो। उसके चतुर्दीक चौड़ी खाई खुदी है और वहयन्त्रों तथा शस्त्रों से परिपूर्ण है। वह लंकापुरी रमणीय है। सुवर्ण और वैदूर्य मणि के उसके द्वार है। पहले वहां राक्षस रहा करते थे, किंतु अब विष्णु के भय से वहां से भाग कर पृथ्वी के नीचे रसातल में जा बसे हैं। तुम वहां जाकर सुख से रहो।

वहां तुम्हें या किसी और को कोई कष्ट नहीं होगा। अपने पिता विश्रवा मुनि के ऐसा कहने पर धर्मात्मा पुत्र वैश्रवण अब राक्षस की चारों ओर समुद्र से घिरी हुई लंका में प्रसन्नता पूर्वक निवास करने लगे।

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