ययाति की कहानी –जो भोग से वैराग्य की ओर ले जाती है।

बहुत समय पहले की बात है। चंद्रवंश में एक महान प्रतापी राजा हुए – राजा नहुष। वे स्वयं इंद्र के पद तक पहुँचे थे, लेकिन अहंकारवश स्वर्ग से गिर पड़े। उनके पुत्र का नाम था ययाति – तेजस्वी, बुद्धिमान और धर्मपरायण।

ययाति का युवराज बनना

ययाति बाल्यकाल से ही धर्म और राजनीति में दक्ष थे। बड़े हुए तो पिता ने उन्हें राज्य सौंप दिया। उन्होंने प्रजा का पालन धर्मपूर्वक किया। उनका यश चारों दिशाओं में फैल गया।

देवयानी और शर्मिष्ठा की कहानी

एक दिन कुछ कन्याएं वन विहार को गई। उसमें दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्यराज व्रशपर्वा की पुत्री शर्मिंष्ठा भी थी। वह सब कन्याएं एक नदी में जाकर निर्वस्त्र होकर स्नान कर रही थी और आपस में खेल रही थी। तभी उसी समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहां से निकले तो सभी कन्याएं सकूचा गई और दौड़ पड़ी, और अपने -अपने वस्त्र पहनने लगी। शीघ्रता के कारण राजकुमारी शर्मिंष्ठा का वस्त्र देवयानी के हाथ लगा और देवयानी का वस्त्र राजकुमारी शर्मिंष्ठा के हाथ आया। और दोनों ने एक दूसरे के वस्त्र पहन लिया। जब राजकुमारी शर्मिंष्ठा ने देवयानी को अपने वस्त्र में देखा तो उसने देवयानी से क्रोध में कहा – ”तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ”, एक ब्राह्मण की पुत्री होकर तुमने हमारे (एक राजकुमारी के) वस्त्र पहन लिए। तभी देवयानी भी क्रोध में बोली – तुम हमारे वस्त्र उतारो, तुम इसके पहनने के लायक नहीं हो। हम दैत्यगुरु शुक्राचार्य की पुत्री है, और हमारे पिता तुम्हारे पिता के गुरु है। जो अपने तपोबल से पूरी श्रष्टि को चला सकते है, ऐसे महान ब्राह्मण की पुत्री है हम। और ये ब्राह्मण पुत्री का वस्त्र, तुझ जैसी एक दैत्य कन्या ने पहन रखा है।

देवयानी की शर्मिंष्ठा को बहुत कड़वा बोलने लगी तभी शर्मिंष्ठा को देवयानी के ऊपर बहुत क्रोध आया और उसने क्रोध में देवयानी को निर्वस्त्र करके कुएं में धक्का देने का आदेश दे दिया। उसी समय ययाति शिकार खेलने वन में आये हुए थे और उन्हें प्यास लगी तो वो उसी कुएं के पास गये। वहां ययाति ने देवयानी को कुएं में बेहोश पड़े देखा तो ययाति ने देवयानी को बाहर निकाला और उसे सुरक्षित वापस पहुँचाया।

इस घटना के बाद देवयानी ने ययाति से विवाह की इच्छा जताई। शुक्राचार्य की अनुमति से ययाति और देवयानी का विवाह हुआ। लेकिन एक शर्त रखी गई – “तुम शर्मिष्ठा से कभी संबंध नहीं रखोगे।”

शर्मिष्ठा से प्रेम और पुत्र

ययाति देवयानी को राजमहल में ले आए। कुछ समय बाद शर्मिष्ठा भी दासी बनकर वहीं रहने लगी।समय बीता… शर्मिष्ठा की सरलता, त्याग और सेवा भाव से ययाति प्रभावित हो गए। उन्होंने शर्मिष्ठा से भी विवाह कर लिया, और उससे संतानें उत्पन्न हुईं।

जब यह बात देवयानी को पता चली, तो वह क्रोध से भर उठी। उन्होंने अपने पिता शुक्राचार्य को बताया। उन्होंने ययाति को श्राप दे दिया –

“हे ययाति! तुम्हारे ऊपर वृद्धावस्था अभी से आ जाएगी!”

अकाल बुढ़ापा और पुत्रों से याचना

ययाति अचानक बूढ़े हो गए। उनका सुंदर रूप, तेज, बल – सब चला गया।

परंतु उनकी इच्छाएँ अभी भी बाकी थीं। उन्होंने सोचा – “मैंने अभी जीवन का पूरा सुख नहीं देखा। मैं अपने पुत्रों से युवावस्था माँगूँगा और भोग पूरे करूँगा।”

उन्होंने एक-एक करके अपने चार पुत्रों – यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, और अनु से कहा,
“हे पुत्र! मुझे अपनी युवावस्था दे दो। मैं कुछ वर्ष भोग कर फिर वृद्धावस्था लौटा दूँगा।”

परंतु चारों पुत्रों ने मना कर दिया। ययाति निराश हुए। तब उन्होंने सबसे छोटे और आज्ञाकारी पुत्र पुरु से कहा।

पुरु ने बिना हिचकिचाए कहा – ” पिताजी मैं अपना यौवन आपको देता हूँ, यह मेरा सौभाग्य होगा। “

भोग की पराकाष्ठा और वैराग्य का जन्म

ययाति ने पुनः युवावस्था पाई और हजारों वर्षों तक भोग-विलास किया। राजाओं की कन्याएँ, ऐश्वर्य, राज्य – उन्होंने किसी सुख की कमी नहीं छोड़ी।

लेकिन…
मन कभी संतुष्ट नहीं हुआ।
इच्छाएँ और बढ़ती गईं।

अंततः उन्होंने स्वयं स्वीकार किया:

“इच्छाएँ अग्नि के समान हैं। उन्हें जितना ईंधन (भोग) दो, वे उतनी ही बढ़ती हैं।”

त्याग और आत्मज्ञान

ययाति ने पुरु को उसका यौवन लौटा दिया और राजपाट भी सौंप दिया। स्वयं वन को प्रस्थान किया। वहाँ जाकर उन्होंने तपस्या की, आत्मज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष को प्राप्त हुए।

शिक्षाप्रद तत्व:

इच्छाओं की पूर्ति भोग से नहीं, वैराग्य और विवेक से होती है।

पुरु की भक्ति, त्याग और सेवा आदर्श है।

ययाति की कथा एक व्यक्ति की भोग से योग की यात्रा है।

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