मत्स्य अवतार की कथा। कैसे श्री हरि ने मत्स्य अवतार लेकर जगत की रक्षा की?

यह कथा अग्नि पुराण के दूसरे अध्याय में वर्णित है, जिसमें अग्नि देव वशिष्ठ जी को कथा सुना रहे हैं।

अग्निदेव बोले – वशिष्ठ! सुनो, मै श्री हरि के मत्स्य अवतार का वर्णन करता हूं। अवतार धारण का कार्य दुष्टों के विनाश और साधु पुरुषों की रक्षा के लिए होता है। बीते हुए कल्प के अंत में ‘ब्राह्म’ नामक प्रलय हुआ था। मुने! उसे समय ‘भू ‘ आदि लोक समुद्र के जल में डूब गए थे। प्रलय के पहले की बात है। वैवस्वत मनु भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए तपस्या कर रहे थे। एक दिन जब कृतमाला नदी में जल से पितरो का तर्पण कर रहे थे, उनकी अंजलि के जल में एक बहुत छोटा सा मत्स्य आ गया। राजा ने उसे जल में फेंक देने का विचार किया। तब मत्स्य ने कहा -‘महाराज! मुझे जल में ना फेंको । यहां ग्राह आदि जल जंतुओं से मुझे भय है।’ यह सुनकर राजा ने उसे अपनी कलश के जल में डाल दिया । मत्स्य उसमें पड़ते ही बड़ा हो गया और पुनः राजा से बोला – ‘ राजन्! मुझे इससे बड़ा स्थान दो।’ उसकी यह बात सुन कर राजा ने उसे एक बड़े जल पात्र में डाल दिया। उसमें भी बड़ा होकर मत्स्य राजा से बोल – ‘ राजन्! मुझे कोई विस्तृत स्थान दो। तब उन्होंने पुनः उसे सरोवर के जल में डाला , किंतु वहां भी बढ़कर वह सरोवर के बराबर हो गया और बोला – ‘मुझे इससे भी बड़ा स्थान दो।’ तब राजा उसे फिर समुद्र में ही ले जाकर डाल दिया। वहां वह मत्स्य क्षण भर में एक लाख योजन बड़ा हो गया। उस अद्भुत मत्स्य को देखकर राजा को बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले – आप कौन हैं ? निश्चय कि आप भगवान विष्णु जान पड़ते हैं। नारायण ! आपको नमस्कार है। जनार्दन ! आप किस लिए मुझे माया से मोहित कर रहे है?

राजा के ऐसा कहने पर सबके पालन में संलग्र रहने वाले मत्स्यरूपधारी भगवान उनसे बोले – ‘ राजन्! मैं दुष्टों का नाश और जगत की रक्षा करने के लिए अवतीर्ण हुआ हु। आज से सातवें दिन समुद्र संपूर्ण जगत को डुबा देगा। उसे समय तुम्हारे पास एक नौका उपस्थित होगी। तुम उसे पर सब प्रकार के बीज आदि रखकर बैठ जाना। सप्तर्षि भी तुम्हारे साथ रहेंगे। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी तब तक तुम उसी नाव पर विचरते रहोगे। नाव आने के बाद मैं भी इसी रूप में उपस्थित होऊँगा। उसे समय तुम मेरी सींग में महासर्पमयी रस्सी से उस नाव को बांध देना।’ ऐसा कहकर भगवान मत्स्य अंतर्धान हो गए और वैवस्वत मनु उनके बताए हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए वहीं रहने लगे। जब नियत समय पर समुद्र अपनी सीमा लाँघकर बढ़ने लगा, तब वे पूर्वोक्त नोका पर बैठ गए। उसी समय एक सींग धारण करने वाले सुवर्णमय मत्स्य भगवान का प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था। उनके सींग में नाव बांधकर राजा ने उनसे ‘मत्स्य’ नामक पुराण का श्रवण किया, जो सब पापों का नाश करने वाला है। मनु भगवान मत्स्य की नाना प्रकार के स्त्रातों द्वारा स्तुति भी करते थे। प्रलय के अंत में ब्रह्मा जी से वेद को हर लेने वाले ‘हयग्रीव’ नामक दानव का वध करके वेद मंत्र आदि की रक्षा की। तत्पश्चात बारहकल्प आने पर श्री हरि ने कच्छप रूप धारण किया।

इस प्रकार अग्नि देव द्वारा कहे गए विद्यासार स्वरूप अग्नि महापुराण में मत्स्य अवतार वर्णन नामक दूसरा अध्याय समाप्त हुआ।

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