भगवान गणेश : विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव

परिचय

हिंदू धर्म में भगवान गणेश को “विघ्नहर्ता” (सभी बाधाओं को दूर करने वाले) और “प्रथम पूज्य” (सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता) कहा जाता है। हर शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी के नाम से होती है। इन्हें बुद्धि, विवेक, समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है।

गणेश जी का जन्म

पुराणों के अनुसार, माता पार्वती ने स्नान के समय अपने शरीर के उबटन से गणेश जी की रचना की और उन्हें द्वार पर पहरेदार बना दिया। जब भगवान शिव अंदर आना चाहते थे, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। इससे क्रोधित होकर शिवजी ने उनका सिर काट दिया। इस बात का पता जब माता पार्वती को चला तो वो अपने पुत्र के वियोग में रोद्र रूप में आ गई। तब सारे देवताओं ने मिलकर माता से शांत होने की विनती की और भगवान शिव ने माता पार्वती को मनाने के लिए गणेश जी का सिर एक हाथी के बच्चे के सिर से जोड़ दिया। तभी से वे गजानन कहलाए।

भगवान गणेश के स्वरूप के प्रतीक

हाथी का सिर – बुद्धि और विशाल सोच का प्रतीक।

बड़ा पेट – धैर्य, सहनशीलता और सबको समेटने का भाव।

सूंड – लचीलेपन और हर परिस्थिति में ढलने की क्षमता।

मूषक (वाहन) – यह दर्शाता है कि सबसे छोटा प्राणी भी महान कार्य कर सकता है।

गणेश जी के प्रमुख नाम

भगवान गणेश के 108 नाम हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
गजानन, विघ्नहर्ता, लंबोदर, विनायक, एकदंत, गणपति, मंगलमूर्ति, सिद्धिविनायक, शिवनन्दन।

गणेश पूजा का महत्व

किसी भी शुभ कार्य, विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार की शुरुआत में गणेश जी की पूजा अवश्य की जाती है।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का पर्व बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

श्रद्धा और भक्ति से गणपति की पूजा करने से बुद्धि, ज्ञान, सफलता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि (संक्षेप में)

  1. सर्वप्रथम स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र पहने और अपने शरीर के साथ अपने मन को भी स्वच्छ
  2. स्वच्छ स्थान पर गणेश जी की मूर्ति/चित्र स्थापित करें।
  3. चावल का आसन बनाकर मूर्ति रखें।
  4. धूप, दीप, पुष्प, दुर्वा अर्पित करें।
  5. “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जाप करें।
  6. गणेश जी की आरती करें।
  7. भोग में मोदक अर्पित करें।

गणेश वंदना

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

अर्थ:
हे वक्रतुण्ड, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान प्रभु! आप मेरे सभी कार्यों को बिना विघ्न के पूर्ण कीजिए।

गणेश जी की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदंत दयावंत चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी॥

पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥

अंधन को आँख देत कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥

सूर्य सम कोटि प्रभा महिमा अति भारी।
जन्मजन्म के दुख टारो भव भय भारी॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए ज्यादा नियम की जरूरत नहीं होती है बस स्वयं का मन साफ रखो और सच्चे दिल से भगवान गणेश की आराधना करो। भगवान गणेश को गुड़ के मोदक बहुत पसंद है। इसलिए भोग में इसे जरूर शामिल करो।

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