श्वेत नाम के मुनि पर्वत की गुफा में ‘ नमस्ते रूद्र मन्येव ‘ इस रुद्राष्ट्राध्यायी से शिव की स्तुति करने में लगे थे। तभी वहाँ महातेजस्वी काल श्वेत मुनि को लेने के लिए उनके पास आया। श्वेत इस काल को देखकर शंकर भगवान की स्तुति करने लगा। त्रयंबक, सुगंधी, पुष्टिवर्धन इत्यादि नामों से शिव को पुकार कर कहने लगें कि मृत्यु मेरा क्या कर सकता है, मैं मृत्यु का भी मृत्यु हूँ। यह देखकर काल बोला – हे श्वेत आ, आ, इस पूजा से कुछ फल नहीं होगा। रुद्र हो या विष्णु कोई भी मेरे द्वारा पकड़े हुए तुझको अब बचा नहीं सकता।
जिसको लेने के लिए मैं उठ खड़ा हुआ, उसको क्षणमात्र में यमलोक को पहुंचा देता हूं। अब तू आयु रहित है और मैं तुझे लेने आया हूँ, तैयार खड़ा हूँ । उसके इस प्रकार भयंकर वचन सुनकर श्वेत मुनि रुद्र का स्मरण करके विलाप करने लगे। फिर काल को और शिवलिंग को देखकर श्वेत मुनि बोले – हे काल! तू मेरा क्या कर सकता है, यह मेरे नाथ वृषभध्वज है, इस शिवलिंग में सर्वदेवमय शंकर मौजूद है। मुझ जैसे शिव भक्तों का तू क्या कर सकता है, जैसे तू आया है,वैसा ही चला जा।
उस भयंकर काल ने श्वेत मुनि से ऐसे वचन सुनकर पाश हाथ में लेकर सिंह की तरह गर्जना करके मुनि को पाश में बांध लिया और बोला – हे श्वेत! तुझे यमलोक को ले जाने के लिए मैंने पाश में बांध लिया। देव रूद्र ने क्या किया ? तेरी भक्ति और पूजा ने क्या फल दिया ? इस लिंग में स्थित रुद्र बिना चेष्टा वाला है, कैसे पूजनीय है। फिर सदाशिव ने मुनि को मारने के लिए आए हुए काल को देख कर हंसते हुए और तीन रूप में( अंबा, गणपति और नन्दी ) प्रकट हुए । उन्हें देखकर काल ने क्षण मात्र में ही जीवित मुनि को छोड़ दिया और मुनि के समीप में ही ऊंचे स्वर से शब्द करता हुआ गिर पड़ा और काल के भी काल शिव को देखकर स्वयं मर गया। देवगण ऊंचे स्वर से महेश्वर, अंबा की स्तुति करने लगे तथा शिव के ऊपर फूलों की वर्षा करने लगे।
काल को मरा हुआ देखकर विस्मित हुए श्वेत मुनि ने शंकर को प्रणाम किया। शंकर भगवान भी ब्राह्मण पर अनुग्रह करके तथा काल को भस्म करके क्षण मात्र में अपने गूढ़ शरीर में प्रवेश कर गए। इसलिए मृत्युंजय शंकर की पूजा करनी चाहिए। वे कलियुग में सबको भक्ति और मुक्ति देने वाले हैं।
शिव की न दान से, न तप से, न व्रतों से, न योग शास्त्रों से भक्ति होती है किंतु भगवान की प्रसन्नता से भक्ति होती है। इसलिए शिव का प्रसन्न मन से पूरी निष्ठा के साथ भक्ति करनी चाहिए।